Murals in Hindi

From his birth at Shivneri to his coronation and his visit to Srisailam — the life of Shivaji Maharaj as told in the murals of the Darbar Hall.

Index of murals

Mural 1

शिवनेरी किले पर शहाजी राजे और जीजामाता द्वारा देवी शिवाई का आशीर्वाद

शहाजी राजे और जीजामाता ने शिवनेरी किले पर देवी शिवाई के दर्शन किए। उस समय जीजामाता गर्भवती थीं, और उनकी देखभाल के लिए किले पर अनुभवी वैद्य नियुक्त किए गए थे।

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Mural 2

शिवाजी का जन्म

19 फ़रवरी 1630 को, अत्यंत शुभ नक्षत्र में, शहाजी राजे की पत्नी जीजाबाई ने शिवनेरी किले पर एक पुत्र को जन्म दिया। शिवनेरी में जन्म होने के कारण बालक का नाम शिवाजी रखा गया। बाद में शहाजी राजे अपने बड़े पुत्र संभाजी के साथ नवजात शिशु को देखने आए। पुत्र के जन्म से अत्यंत प्रसन्न होकर उन्होंने इस खुशी में खुले हाथों से दान दिया।

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Mural 3

रोहिडेश्वर में शिवाजी और उनके साथियों की शपथ

पुणे प्रांत के लोग स्वराज के विचार से प्रेरित हो रहे थे और सल्तनत के अत्याचारों के विरुद्ध आवाज़ उठा रहे थे। 23 मई 1642 को बारह वर्ष के बालक शिवाजी और उनके साथियों ने रोहिडेश्वर के पवित्र शिव मंदिर में मिलकर स्वराज की शपथ ली।

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Mural 4

शिवाजी की शिक्षा

बालक शिवाजी श्रुति, स्मृति और पुराण, राजनीति, रामायण और महाभारत, काव्य, व्यायाम, वास्तुकला, धनुर्विद्या, अनेक भाषाओं, श्लोकों और सूक्तियों, तथा हाथी, घोड़े और रथ की सवारी में निपुण हो गए। उन्हें तलवार, धनुष, चक्र और भाले के प्रयोग तथा युद्ध की विभिन्न विधाओं का प्रशिक्षण दिया गया। उन्होंने किलों का निर्माण, सैन्य रणनीति, बच निकलने की युक्तियाँ, विष की पहचान, रत्नों की परख और अन्य कलाएँ व विद्याएँ भी सीखीं।

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Mural 5

तोरणा और राजगढ़ पर अधिकार

पुणे के दक्षिण-पश्चिम में कानद घाटी में तोरणा किला वीरान पड़ा था। वहाँ कोई आदिलशाही सरदार तैनात नहीं था, और युवा शिवाजी राजे ने 1645–46 के दौरान इस किले पर अधिकार कर लिया। तोरणा के दक्षिण-पूर्व में मुरुंबदेव नाम का एक पहाड़ था, जिस पर भी किसी का पहरा नहीं था। शिवाजी ने इस पहाड़ को अपने नियंत्रण में लिया और तुरंत उस पर एक किले का निर्माण शुरू किया, जिसका नाम उन्होंने राजगढ़ रखा। आगे चलकर राजगढ़ मराठा राज्य की पहली राजधानी बना।

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Mural 6

मराठा नौसेना का आरंभ

शिवाजी महाराज ने 24 अक्टूबर 1657 को कल्याण और भिवंडी पर विजय प्राप्त की, और बाद में पेण भी उनके अधिकार में आ गया। इन स्थानों पर उन्होंने जहाज़ बनवाना शुरू किया। पुर्तगाली कारीगरों की सहायता से शिवाजी महाराज ने युद्धपोत बनवाए और समुद्र में मराठा शक्ति की स्थापना की। मराठा बेड़े में गलबत, गुराब, मचवा, तरांडे, पाल, तिरकटी, महागिरी, तरु और फतेमार जैसे युद्धपोत, तथा मचवा, बतेला, तरु, शिबाड, महागिरी, बालव और मांजी जैसे व्यापारी जहाज़ शामिल थे।

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Mural 7

अफ़ज़ल ख़ान ने चुनौती स्वीकार की

शिवाजी महाराज की बढ़ती शक्ति को रोकने के लिए अली आदिलशाह और बड़ी साहिबा ने मराठा राजा के विरुद्ध एक शाही सेनापति भेजने का निर्णय किया। किंतु आदिलशाही दरबार का कोई भी सरदार यह ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं था। उसी समय अफ़ज़ल ख़ान आगे आया, उसने तांबूल (पान का बीड़ा) उठाया और घोषणा की, “शिवाजी कौन है? मैं घोड़े से उतरे बिना ही उसे ज़िंदा क़ैद करके ले आऊँगा।”

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Mural 8

प्रतापगढ़ की भेंट

गुरुवार, 10 नवंबर 1659 को प्रतापगढ़ में शिवाजी महाराज और अफ़ज़ल ख़ान की भेंट हुई। भेंट के दौरान अफ़ज़ल ख़ान ने शिवाजी महाराज से पूरी तरह आत्मसमर्पण करने को कहा और उन्हें गले लगाने के लिए बाँहें फैलाईं। गले मिलते ही अफ़ज़ल ख़ान ने शिवाजी महाराज का सिर अपनी बाईं बगल में दबा लिया और छिपी हुई कटार से उनकी बगल पर वार किया। शिवाजी महाराज ने अपने अंगरखे के नीचे कवच पहना हुआ था, इसलिए कटार कवच को केवल छूकर रह गई और उनका वस्त्र फट गया।

पलक झपकते ही शिवाजी महाराज ने अपने बाएँ हाथ के वाघनख और दाएँ हाथ की कटार से पलटवार किया, और इस मुठभेड़ में अफ़ज़ल ख़ान मारा गया।

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Mural 9

घोड़खिंड में बाजीप्रभु देशपांडे का पराक्रम

13 जुलाई 1660 को सिद्दी जौहर की सेना ने पन्हाला किले को घेर लिया। शिवाजी महाराज के गुप्तचरों ने बाहर निकलने का मार्ग खोजने के लिए अथक परिश्रम किया, और शिवाजी महाराज पालकी में बैठकर घोड़खिंड की ओर निकल पड़े, जबकि शत्रु सेना उनका पीछा कर रही थी। आती हुई सेना को देखकर बाजीप्रभु देशपांडे ने घोड़खिंड के दर्रे को रोके रखने का संकल्प लिया। वे बड़े साहस से लड़े और शिवाजी महाराज के विशालगढ़ किले पर सुरक्षित पहुँचने तक शत्रु को रोके रखते हुए उन्होंने अपने प्राणों का बलिदान दे दिया।

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Mural 10

शाइस्ता ख़ान पर अचानक हमला

दिल्ली के मुग़ल सिंहासन पर अधिकार करने के बाद औरंगज़ेब ने 1660 में अपने मामा शाइस्ता ख़ान को दक्कन का सूबेदार नियुक्त किया और उसे 80,000 की सेना दी। पुणे में शिवाजी महाराज के अपने लाल महल में ठहरकर नए सूबेदार ने मराठा राज्य को उजाड़ना शुरू कर दिया। 5 अप्रैल 1663 की रात शिवाजी महाराज ने शाइस्ता ख़ान के निवास पर साहसिक हमला किया। उन्होंने अपना बचपन इसी महल में बिताया था, इसलिए वे इसके चप्पे-चप्पे से परिचित थे। शाइस्ता ख़ान हमले में बच तो गया, पर उसके दाहिने हाथ की तीन उँगलियाँ कट गईं। भयभीत होकर वह तीन दिनों के भीतर अपनी पूरी सेना के साथ पुणे छोड़कर चला गया, और राज्य पर से संकट टल गया।

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Mural 11

मुरारबाजी देशपांडे का बलिदान

शिवाजी महाराज की लगातार विजयों का बदला लेने के लिए औरंगज़ेब ने अपने दो प्रमुख मनसबदारों, मिर्ज़ा राजा जयसिंह और दिलेर ख़ान को दक्कन भेजा। उन्होंने पुरंदर किले को घेर लिया, जहाँ मुरारबाजी देशपांडे मराठों का नेतृत्व कर रहे थे। जून 1665 में दिलेर ख़ान द्वारा पुरंदर पर बड़ा आक्रमण करने के बाद भीषण युद्ध हुआ। मुरारबाजी के पराक्रम से प्रभावित होकर दिलेर ख़ान ने उन्हें मुग़ल सेना में शामिल होने का लालच दिया। मुरारबाजी ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया और सीधे दिलेर ख़ान पर टूट पड़े, किंतु एक तीर उनकी गर्दन में आ लगा। मुरारबाजी देशपांडे ने मराठा राज्य के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

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Mural 12

शिवाजी महाराज की आगरा यात्रा

शिवाजी महाराज औरंगज़ेब से मिलने आगरा गए, और 12 मई 1666 को आगरा के लाल किले के दीवान-ए-ख़ास में उससे मिले। दरबार में अपमानित होने पर शिवाजी महाराज मयूर सिंहासन की ओर पीठ करके दरबार से चले गए। औरंगज़ेब ने उन्हें बंदी बना लिया। अपने पुत्र संभाजी के साथ शिवाजी महाराज 17 अगस्त 1666 को औरंगज़ेब की क़ैद से निकल भागे और तीन महीने की लंबी यात्रा के बाद 20 नवंबर 1666 को सुरक्षित राजगढ़ पहुँचे।

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Mural 13

तानाजी मालुसरे

शिवाजी महाराज की गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए औरंगज़ेब ने मिर्ज़ा राजा जयसिंह को विशाल सेना के साथ मराठा राज्य के विरुद्ध भेजा। शिवाजी महाराज को जयसिंह के साथ संधि करनी पड़ी, जिसमें उन्होंने तेईस किले और चार लाख होन राजस्व वाला क्षेत्र मुग़लों को सौंप दिया। इन किलों को फिर से जीतने का अभियान सूबेदार तानाजी मालुसरे ने शुरू किया। 4 फ़रवरी 1670 को उदयभान राठौड़ के साथ भीषण युद्ध में उन्होंने प्राणों का बलिदान दिया और सिंहगढ़ जीत लिया। तानाजी की मृत्यु से शिवाजी महाराज अत्यंत दुखी हुए और बोले, ‘गढ़ तो जीत लिया, पर सिंह चला गया।’

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Mural 14

शिवाजी महाराज और समर्थ रामदास स्वामी की भेंट

1672 ई. के श्रावण मास में चाफल के निकट शिवाजी महाराज और समर्थ रामदास स्वामी की भेंट हुई, और दोनों के बीच गहरा संबंध बन गया। शिवाजी महाराज ने परळी किला, जिसे सज्जनगढ़ भी कहा जाता है, रामदास स्वामी को उनके निवास के लिए प्रदान किया।

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Mural 15

शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक

ज्येष्ठ शुद्ध त्रयोदशी, शनिवार, शक 1596, आनंद संवत्सर — 6 जून 1674 — को रायगढ़ में शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ। जब वे सिंहासन पर विराजमान हुए, तो सभा ‘प्रौढ़ प्रताप पुरंदर, क्षत्रिय कुलावतंस, सिंहासनाधीश्वर, महाराजाधिराज, श्री शिव छत्रपति की जय!’ के जयघोष से गूँज उठी। अंग्रेज़ दूत हेनरी ऑक्सेंडन, जॉर्ज रॉबिन्सन और थॉमस मिचेल राज्याभिषेक में उपस्थित रहे और उन्होंने बहुमूल्य उपहार भेंट किए। इस राज्याभिषेक के साथ भारतीय संप्रभुता की पुनः स्थापना हुई।

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Mural 16

भागानगर में शिवाजी महाराज की अबुल हसन कुतुबशाह से भेंट

शिवाजी महाराज गोलकोंडा के अबुल हसन तानाशाह कुतुबशाह से मिलने गए और 5 फ़रवरी 1677 को भागानगर में प्रवेश किया। पूरा नगर सजाया गया था: कुमकुम और केसर की रंगोलियाँ बनाई गईं, जगह-जगह बंदनवार और पताकाएँ लगाई गईं, और गुढ़ियाँ व तोरण खड़े किए गए। पूरा भागानगर शिवाजी महाराज के दर्शन के लिए उत्सुक था, और नगर में प्रवेश करते ही उन पर सोने और चाँदी के फूलों की वर्षा की गई।

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Mural 17

शिवाजी महाराज का कर्नाटक अभियान

कोप्पल के पीड़ित नागरिक शिवाजी महाराज के पास आए और वहाँ के पठान शासकों की क्रूरता से मुक्ति दिलाने की विनती की। शिवाजी महाराज ने यह कार्य सरसेनापति हंबीरराव मोहिते को सौंपा, और हंबीरराव अपनी सेना लेकर कोप्पल की ओर बढ़े। युद्ध में नागोजी जेधे ने ख़ान के हाथी को घायल कर दिया, जबकि हुसैन ख़ान मियाना ने नागोजी जेधे पर तीर चलाया। हंबीरराव मोहिते ने ख़ान को बंदी बना लिया और उसके साथ 2,000 घोड़े, अनेक हाथी और भारी मात्रा में बहुमूल्य संपत्ति भी हासिल की, जिसे उन्होंने स्वराज्य के लिए शिवाजी महाराज को भेंट कर दिया।

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Mural 18

दाद महल में भेंट

शिवाजी महाराज और अबुल हसन तानाशाह कुतुबशाह की भेंट गोलकोंडा किले के दाद महल में हुई। दोनों गले मिले, और शिवाजी महाराज से प्रसन्न होकर कुतुबशाह ने उन्हें अपने बगल में बिठाकर सम्मानित किया। दोनों के बीच लंबी बातचीत हुई और उन्होंने बहुमूल्य उपहारों का आदान-प्रदान किया। इस अवसर पर कुतुबशाही मंत्री अक्कन्ना और मादन्ना भी उपस्थित थे।

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Mural 19

कुतुबशाह के बलशाली हाथी के सामने येसाजी का पराक्रम

19 फ़रवरी 1677 को येसाजी ने कुतुबशाह के बलशाली हाथी का बहादुरी से सामना किया और अपनी तलवार से उसकी सूँड़ काट डाली — यह स्वराज्य के सैनिकों के साहस का प्रमाण था।

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Mural 20

मादन्ना के घर शिवाजी महाराज का भोजन

हैदराबाद में एक महीने से अधिक समय तक भेंटों और निमंत्रणों का सिलसिला चलता रहा। एक दिन प्रधान मादन्ना ने स्वयं शिवाजी महाराज को अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया, और शिवाजी महाराज ने यह निमंत्रण सहर्ष स्वीकार किया। मादन्ना की माता भागम्मा ने स्वयं भोजन पकाया। भागम्मा, मादन्ना और अक्कन्ना ने अनेक विषयों पर शिवाजी महाराज से खुलकर बातचीत की, और शिवाजी महाराज ने उपहार के रूप में हाथी, घोड़े, वस्त्र और आभूषण भेंट किए।

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Mural 21

शिवाजी महाराज की श्रीशैलम यात्रा

बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक, श्रीशैलम के श्री मल्लिकार्जुन के दर्शन के लिए शिवाजी महाराज की यात्रा भली-भाँति प्रलेखित है। वे मल्लिकार्जुन की पूजा करने के लिए 24 मार्च 1677 को श्रीशैलम पहुँचे और कृष्णा नदी के तट पर स्थित इस तीर्थस्थल पर 1 अप्रैल 1677 तक रहे।

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Mural 22

तिरुपति बालाजी के दर्शन

शिवाजी महाराज ने 4 मई 1677 को तिरुपति बालाजी के दर्शन किए। तिरुपति और श्रीकालहस्ती होते हुए चेन्नई, और वहाँ से कांचीपुरम होते हुए वे 9 मई 1677 को जिंजी के मज़बूत किले पर पहुँचे।

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Mural 23

जिंजी और व्यंकोजी राजे से भेंट

शिवाजी महाराज ने 9 मई 1677 को जिंजी के विशाल किले को घेर लिया। जिंजी तीन दुर्गों — राजगिरि, कृष्णगिरि और चंद्रगिरि — से मिलकर बना है, और उस समय इसका सेनापति नासिर मुहम्मद ख़ान था। शिवाजी महाराज ने 13 मई 1677 को किला जीत लिया और उसे सुदृढ़ किया। 1690 से 1698 तक जिंजी मराठा राज्य की राजधानी रहा।

इसके बाद शिवाजी महाराज कोल्लिडम (कोलेरून) नदी के रास्ते तिरुमलवाडी गए, ताकि अपने सौतेले भाई व्यंकोजी राजे से मिल सकें, और वे स्वयं आगे बढ़कर उनका स्वागत करने गए। दोनों भाइयों की भेंट 12 जुलाई 1677 के बाद तिरुपनरुति गाँव के पुष्पभानेश्वर मंदिर में हुई, जहाँ उन्होंने लंबी चर्चा की और बहुमूल्य उपहारों का आदान-प्रदान किया।

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